Wednesday, 16 May 2012

Hadeesi hadse 35


बुखारी ५३
"एक शक्स मुहम्मद के पास इस्लाम क़ुबूल करने के किए आया, मुहम्मद ने शर्त लगाई कि तुम्हें मुसलमानों का खैर ख्वाह रहना होगा."
*इस्लाम इंसान को तअस्सुबी बनाता है. तअस्सुबी फ़र्द कभी ईमान दार नहीं हो सकता और ही मुंसिफ.

बुखारी ५५
"मुहम्मद नमाज़ से पहले वजू (मुंह, हाथ और पैर धोना) करने में एडियों को चीर कर न धोने वाले नमाजियों को आगाह करते है कि इस सूरत में एडिया दोज़ख में डाल दी जाएंगी"
*मुहम्मदी अल्लाह की बातों को सर आँख पर रख कर जीने वालों को कभी कभी जिंदगी दूभर हो जाती है. दिन में पाँच बार वज़ू करना और उसमें पैरों की बेवाई को चीर चीर कर धोने जैसे सैकड़ों नियम हैं जिनकी पाबन्दी न करने पर जन्नत हराम हो जाती है.
नई और बेहतर ज़िन्दगी मुसलमानों को जीते जी हराम सी होती है.

बुखारी ५८
मुहम्मद ने एक बार अपना ख़त कसरा (ईरान के बादशाह) को भेजा जिसे पढ़ कर उसने ख़त के टुकड़े टुकड़े करके हवा में उड़ा दिया. एलची से इसकी खबर मिलने के बाद मुहम्मद ने बाद दुआ देते हुए कहा इसके टुकड़े टुकड़े मेरे ख़त की तरह कर दिए जाएँ.

बुखारी ७६
एक दिन मुहम्मद की बड़ी साली इस्मा मुहम्मद के घर गईं, देखा मियाँ बीवी दोनों नमाज़ में लगे थे. इस्मा ने बहन आयशा से पूछा क्या बात है, दोनों नमाज़ों में लगे हुए हो, कोई खास बात है? क़यामत तो नहीं आने वाली? और इस्मा भी नमाज़ पढने लगीं .
मुहम्मद नमाज़ से फारिग हुए और इस्मा से कहने लगे.
"मुझे वह्यी नाजिल हुई है कि कब्र में जब मुर्दा रखा  जाएगा तो  उस से सवाल होगा ...
" तू मुहम्मदुर-रसूल्लिलाह के बारे में क्या जानता है ?"
मुर्दा अगर कहेगा " वह एक सच्चे अल्लाह के रसूल थे, हमारे पास अल्लाह का पैगाम लेकर आए थे." वह जन्नत में जाएगा
और अगर कहेगा " नहीं मैं नहीं जानता" तो जहन्नम रसीदा होगा.
*मुहम्मद के ज़मीर में कितनी गन्दगी थी कि किसी लान्हे अपनी खुद नुमाई से न चूकते.

बुखारी ९०
झूटों के पुतले मुहम्मद कहते हैं कि "जो उन पर झूट बांधेगा वह दोज़ख में अपना मकान बनाएगा."
*अभी तक अल्लाह ही गैर मुअत्बर है वह पूरी तरह से दुन्या में ज़ाहिर नहीं हुवा तो उसका रसूल होने कि बात ही मुहम्मद को मुजस्सम झूट साबित करता है. उसके बाद बचता क्या है?

बुखारी ९५
मुहम्मद कहते हैं "जो औरतें यहाँ दुन्या में उम्दः लिबास पहनती हैं वह क़यामत में उरयाँ होंगी"
*कठ मुल्ला की बातें! गोया जो इस दुन्या में मामूली लिबास पहनेगी, वह क़यामत में सुर्ख़ रू होगी. और जो लिबास से ही मुबररा होंगी उनको क़यामत में उम्दः लिबासों में देखा जाएगा . मुहम्मदी फार्मूला तो यही कहता है.

बुखारी १००
अबू हरीरा कहते हैं मुहम्मद से उन्हों ने दो इल्म हासिल किए थे जिसमें एक को मैं ज़ाहिर कर चुका हूँ, दूसरा मैं ज़ाहिर करूँ तो मेरी ज़बान काट ली जाए.
*अबू हरीरा मुहम्मद के बहुत क़रीब थे कि दूसरे इल्म को ज़ाहिर नहीं कर रहे. गालिबन वह इल्म "इल्मे-सदाक़त" होगा जो कि मुहम्म्द ने उन से बतलाया होगा,इल्म सदाक़त यह कि मैं झूठा हूँ और मेरा अल्लाह मुकम्मल तौर पर झूठा है.

बुखारी १३३
अव्वल दर्जे के झूठे सहाबी अनस कहते हैं कि "एक दिन वज़ू के लिए पानी मयस्सर न था, काफ़ी तलाश के बाद भी न मिला तो मुहम्म्द ने एक बर्तन तलब किया और उस पर हाथ रख दिया फिर आवाज़ दी कि आओ जिनको वजू करना है. झूठा अनस कहता है कि उसने देखा कि मुहम्म्द की उँगलियों से पानी की धार निकल रहा था."

बुखारी १७०
"किसी क़बीले के चंद लोग मुहम्मद के पास आए जो पेट के मरज़ में मुब्तिला थे, चारा गरी की दरख्वास्त की. मुहम्मद उन्हें अपने ऊंटों वाले फार्म हॉउस के लिए भेज दिया कि यह लोग वहां ऊंटों के दूध और पेशाब पीते रहने से तंदरुस्त हो जाएँगे.  क़बीले के लोगों ने इस पर अमल किया और कुछ दिनों बाद ठीक भी हो गए. ठीक होने के बाद उन लोगों की नियत वहाँ के ऊंटों पर खराब हो गई और फॉर्म हॉउस के मुहाफ़िज़ को मार के सारे ऊंटों को लेकर फ़रार हो गए. इसकी खबर जब मुहम्मद को मिली तो उन्हों ने तेज़ रफ़्तार ऊँट सवारों को उनके पीछे दौड़ाया.
वह सभी पकड़ लिए गए और उनको मुहम्मद से सामने पेश किया गया. मुहम्मद ने इनके साथ जो बर्ताव किया, इबरत की हदों को पर कर गया. उन्हों ने उनके हाथों और पैरों को पहले कटवाया फिर गरम शीशा उनकी आँखों में डाल कर पहाड़ों के नीचे खाईं में  फिकवा दिया. इस दौरान मुजरिम पानी पानी चिल्लाते रहे, उनको पानी दिया. "
ये था मुहम्मद का ज़ालिमाना बर्ताव जिन्हें मुसलमान सरवरे कायनात कहते हैं और मुह्सिने-इंसानियत.
सज़ाए मौत माना कि जायज़ थी मगर मौत से पहले मुजरिम की आखरी ख्वाहिस पूछना तो दर किनार, हाथ पैर काटना, आँखों में पिघला हुवा शीशा पिलाना और उनकी हलक़ को पानी से महरूम रख कर पहाड़ी की ऊँचाइयों से खाईं में फिकवाना , क्या यही पैगम्बरी शान थी? 
मुहम्मेद बहुत ही ज़ालिम इंसान थे जिनके डर से मुसलमान आज भी दहला हुवा है.

बुखारी १७३
मुहम्मद का फरमान है कि जो शख्स जिहाद करते हुए अल्लाह की राह में ज़ख़्मी होता है, क़यामत के दिन अपना ज़ख्म ताज़ा पाएगा जिसमे से मुश्क की खुशबू   रही होगी."
मुहम्मद जंग, गारत गारी और बरबरियत के लिए हर हर हरबे इस्तेमाल करने की नई नई चालें ईजाद करते, चाहे उसमें बेवकूफी ही क्यूँ नज़र आए. ज़ख़्मी शख्स ज़ख्म से परीशान और रुसवा--ज़माना क़यामत के रोज़ ज़ख्म को ढ़ोता रहे, अपने ज़ख्म से मुश्क की खुशबू उड़ाते हुए .

बुखारी १७५
मुन्ताकिम मुहम्मद के पैगाम्बराना मिज़ाज इस वाक़िए से लगाया जा सकता है कि मुहम्मद कितने अज़ीम या कितने कम ज़र्फ़ हस्ती थे, मफ्रूज़ा मोह्सिने-इंसानियत.
मुहम्मद खाना-काबा में मसरूफ इबादत थे कि अबू जेहल और उसके साथियों ने ऊँट की ओझडी उन पर लाद दी. मुहम्मद ने बाद नमाज़ उन नामाकूलों के लिए बद दुआ दी. ये वाकिया शुरूआती दौर इस्लाम का है.

जंगे-बदर में इन नमाकूलो को मुहम्मद ने चुन चुन कर मौत के घाट उतरा. इनकी लाशों को तीन दिनों तक सड़ने दिया, उनको एक एक का नाम लेकर बदर के कुवें में फ़िक्वाया २०-२२ लाशों से उस जिंदा कुवें को पाटा. उस वक़्त अरब का वह कुवाँ अवाम के लिए कीमती था ?और सभी मकतूल मुहम्मद के अज़ीज़ और अकारिब थे.
 


जीम. मोमिन 

Saturday, 12 May 2012

आज की खबर हमारी आगाही के गवाह हैं.






मैं बार बार मुसलमानों को आगाह कर रह हूँ कि इस्लाम को तर्क करके ईमान दार मोमिन बन जाओ. हिम्मत करके मुस्लिम से मोमिन हो जाओ.
फिर आगाह करता हूँ कि ५० साल के अन्दर अन्दर ऐसा वक़्त आने वाला है कि पूरी दुन्या में मुसलामानों का जीना मुश्किल हो जायगा. उस वक़्त हमारे सामने मौत होगी या फिर ज़िल्लत भरा धर्मांतरण यानी दो नंबर के बशिदे. हर ग़ैर मुस्लिम मुल्क के मुस्लिम बशिदे पर उनके ही मुल्क में उनके लिए जम्हूरियत के मअनी बदल जाएँगे. गैर मुस्लिम के लिए जम्हूरियत कुछ होगी और मुसलमानों के लिए कुछ. मुसलमानो पर जज़िया ठोका जाएगा, जैसे माज़ी में मुसलामानों ने गैर मुस्लिम पर लागू किया था.
मुसलामानों के मरकज़ में सूरत हाल नाकाबिले बयान होगी . मक्का मदीना की सभी इस्लामी नुकूश काबा से लेकर मस्जिएद नबवी तक बमों के ज़रिए उड़ा दिए जाएगे. मुहम्मदी नस्ल और उस वक़्त के उनके हामियों पर जीना हरम हो जाएगा  जिन्हों  ने १४ सौ सालों पहले मक्का और मदीना में बसे यहूदियों और ईसाइयों को तलवार के जोर  पर मुसलमान कर लिया था. 
अमरीका योरोप और इनके हिमायती मुल्क एक गुट बनाएँगे और पूरी दुन्या को मजबूर कर देंगे कि अपने अपने मुल्कों में बसे मुसलमनो पर दायरा तंग कर दें. 
और वह हक़ बजनिब होंगे
 कि मुसलमान कल भी दुश्मने-इंसानियत थे और आज भी दुश्मने इन्सानिता हैं. क्योकि हर मुसलमान अन्दर से तालिबानी होता है, और इनमें ही, जो ज़रा वसीउन नज़र है, उसको भी तालिबानी मुस्लिम अपना दुश्मन समझते है.
हमारे मुल्क हिदुस्तान में आमिर खान, शाहरुख़ खान, सलमान खान और ए पी जे अब्दुल कलाम जैसे लोग सुर्कुरू होंगे जिन्हों ने इन्कलाब के क़ब्ल ही अपनी पहचान बना ली है.
आज की खबर हमारी आगाही के गवाह हैं. हम इसकी एक झलक पेश कर रहे हैं. . . .
  



जीम. मोमिन 

Wednesday, 9 May 2012

Hadeesi Hadse 33


बुखारी नम्बर -८ 
"इस्लाम के पांच एहकाम १-कलमाए-वदनियत २-नमाज़ ३-ज़कात ४- रोज़ा ५-हज "
यह तमान एहकाम ग़ैर तामीरी हैं.

बुखारी नम्बर -९-१३ 
इन सब हदीसों  में इस्लाम मुसलमानों को तअस्सुबी बनाता   है. मुसलमानों को पक्षपात की तालीम देता है जिसके सबब मुसलमान कभी इन्साफ की बात नहीं कर सकता. 

बुखारी नम्बर -१४-१६ 
"महम्मद कहते हैं कि कोई शख्स तब तक मुसलमान नहीं हो सकता जब तक मुझे अपने मान-बाप और औलाद से भी ज्यादा न चाहता हो".
मुहम्मद निर्मल बाबा से भी चार क़दम आगे हैं. आम मुसलमान मुहम्मद के नाम पर जान भी दे सकता है और जान ले भी सकता है. ये बात दुन्या औए खुद आलम-इस्लाम के लिए ज़हर है. मुहम्मद कितने खुद पसंद और महत्वा-कांक्ष साबित हुए. 

बुखारी नम्बर -१९ 
"मुहम्मद कहते हैं कि वह वक़्त आएगा कि लोगों का बेहतरीन माल बकरियाँ होंगी. वह इनको लेकर जंगलों और पहाड़ों पर घूमता फिरेगा ताकि उसका इमान बचा रहे."
मुहम्मद को बकरियां बहुत पसंद थीं. वह इनके बाड़ों में अक्सर नमाज़ें पढ़ा करते. किस क़द्र बद ज़ौक थे? उनके कपड़ों से हमेशा बोक्राहिंद आती थी. 

बुखारी नम्बर -२४ 
"मुहम्मद कहते हैं कि हमें लोगों से उस वक़्त तक जिहाद करनी चाहिए जब तक वह ला इलाहा इल्लिलाह मुहम्मदुर रसूल लिल्लाह न कह दें और नमाज़ व् ज़कात अदा न करने लगें और जब वह इन उमूर को अदा करने लगें तो वह मेरी जानिब से महफूज़ हुए. उनका हिसाब अल्लाह तअला करेगा."
दुश्मने-इसानियत कहते है कि जब तक लोग उनको अल्लाह का दूत न मान लें, उनसे जंग करते रहो . यही मुहम्मदी इस्लाम आ असली चेहरा है. इस पर अमल कर रहे हैं तालिबान. 
मुहम्मद को अपना रसूल मानने वाले ही इस वक़्त उनके एहकाम के कायल हैं इनको जवाबन क्या आज इस समाज और इस मुल्क में रहने का हक मिलना चाहिए? मुसलमान देश के कानून का नाजायज़ फ़ायदा उठा रहे हैं . जम्हूरियत मुसलमानों पर हराम कर देना चाहिए अगर वह नए सिरे से इस्लाम को न समझे.

बुखारी नम्बर -२५ 
"मुहम्मद से दरयाफ्त किया गया कौन सा अमल अफज़ल हैं?
फ़रमाया अल्लाह और रसूल पर ईमान लाना.
इसके बाद ?दूसरा सवाल था.
अल्लाह की राह में जिहाद करना .
तीसरा अमल ? सवाल था.
फ़रमाया हज खालिस" .
कुरआन और हदीसों में सैकड़ों बार दोहराया गया है कि जेहाद करो यानी लड़ो मारो और मरो, खूने-इंसानी बहाओ और लूट मार करके लोगों से
 माले-गनीमत हासिल करो. जिहाद के नए मअनी आज के मक्कार ओलिमा ने लफज़ी तकरार से "जिहद करना" बतला रहे हैं. अर्थात कोशिश करना , जूझना , यत्न करना.
जिहद शब्द एक वचन है और इसका बहुवचन होता है. जिहाद  करना यानि जद्दो-जिहद और जिहाद इस्लामी इस्तेलाह में मज़हबी जंग अर्थात धर्म युद्ध. 
सिर्फ इस्लाम ऐसा धर्म है जो लूट मर को पुन्य कार्य समझता है
बुखारी नम्बर -२६ 
"एक हदीस में रवायत है कि मुहम्मद कुछ लोगों को मॉल तकसीम कर रहे थे कि उनमे से एक को छोड़ दिया . इस पर इनके साथी विकास ने कहा , या रालूलल्लाह इसको क्यूं छोड़ दिया? जो कि मेरे नज़दीक सब से ज्यादह ईमान वाला मोमिन है. मुहम्मद ने कहा ये मत कहो कि अच्छा मोमिन है ये कहो कि सबसे अच्छा मुस्लिम है. कुछ देर खामोश रहने के बाद फिर विकास ने कहा या रालूलल्लाह वह मेरे नज़दीक इन सब में ज्यादह ईमान वाला मोमिन है. रसूल ने कहा ये न कहो कि तुम उसे मोमिन जानते हो , ये कहो कि मुस्लिम जानते हो नमाज़ रोज़े के साथ उसके ईमान को तो सिर्फ अल्लाह  ही जनता है........" 
मोमिन और मुस्लिम का फर्क यहाँ मुहम्मद साफ़ साफ़ बयान कर रहे हैं. 
इसी बात को मैं बार बार दोहराता हूँ कि कुछ बनना है तो इमान दार  मोमिन बनो, मुस्लिम बनना बहुत आसान है.मोमिन बन जाने के बाद मुस्लिम बनना गुनेह गारी है. 

बुखारी नम्बर -२७ 
"मुहम्मद कहते हैं कि एक बार उनके सामने दोजख पेश की गई जिसमे उन्हों ने देखा की औरतें कसरत से थीं क्यूंकि ये नाशुक्री बहुत करती हैं. एहसान फरामोश होती हैं, अगर तुम इनमें किसी के साथ एहसान करते रहो तो वह ज़रा सी बद उन्वानी पर कह दिया करती हैं कि हमने तुझ में कोई नेकी नहीं देखी." 
मुल्ला जी झूटी तक़रीर किया करते हैं कि उनके हुज़ूर ने औरतों का हक सबसे ज़्यादः अदा किया है. जिससे उल्टा औरतें मुहम्मद के पैरों के नीचे आँखें बिछाए रहती हैं.

बुखारी नम्बर -३० 
ज़ुल्म अज़ीमुश्शान 
"मुहम्मद और उनका अल्लाह शिर्क को ज़ुल्म अज़ीमुश्शान कहता है, यानी शानदार ज़ुल्म". शानदार बुराई. 
अल्लाह और मुहम्मद को अल्फाज़ का इस्तेमाल भी नहीं आता , वह बदतरीन ज़ुल्म कि जगह पर ज़ुल्म अज़ीमुश्शान कहते हैं. .

बुखारी नम्बर -34
"मुहम्मद कहते है कि अल्लाह का इरशाद है जो शख्स सिर्फ मेरी रजामंदी और मेरे ऊपर ईमान लाए और मेरे रसूल की तस्दीक की वजह से मेरे रस्ते में जिहाद की गरज से निकलता  है तो मेरे लिए यह मुक़र्रर है उज्र ओ गनीमत अता फ़रमा  कर बा नील ओ मराम वापस कर दूं या जन्नत में दाखिल कर दूं .
आगे मुहम्मद कहते हैं कि अगर मुझको अपनी उम्मत की परेशानी का खौफ न होता तो मुजाहिद के लश्कर से पीछे न रहता और ये पसंद करता कि मैं अल्लाह के  राह मरकर कर जिंदा हों, फिर शहीद होकर जिंदा हों, फिर शहीद होकर हों जिंदा हों फिर शहीद होकर जिंदा हों." 
मुहम्मद नए नए मुसलमान हुए लोगों के घर घर जाकर लोगों के लिए जंग का प्रचार करते , डरा कर, लालच देकर, फ़र्ज़ करार देकर ,बहर सूरत मुहम्मद जंग के फ़ितने में लागों को झोकते. इसी की एक कड़ी मौजूदा हदीस है. खुद मैदाने- जंग से दूर रहते. उम्मत की परेशानी की बात करने वाले मुहम्मद ने अपनी मौत के बाद का अंजाम कभी सोंचा ?
 इनकी नस्लें ख़त्म हो गई.
मुहम्मद को समझना अक्ल की बात नहीं, हिम्मत का सवाल है. उस वक़्त भी लोग उनकी गुंडा गर्दी से डरते थे, आज भी उनके गुर्गों की गुंडा गर्दी से खौफ खाते हैं.

बुखारी नम्बर -४७ 
"एक दिन मुहम्मद लोगों के झुरमुट में बैठे थे कि एक शख्स आया और उसने मुहम्मद से दर्याफ़्त किया कि 
ईमान क्या है? 
मुहम्मद ने कहा ईमान ये है कि तुम खुदा पर और उसके फरिश्तो पर और खुदा की मुलाक़ात पर और उसके रसूल पर ईमान रख्खो, मरकर ज़िन्दः होने को हक समझो. 
उसने फिर पूछा इस्लाम क्या है?
 कहा इस्लाम ये है कि तुम सिर्फ़ खुदा की ही इबादत करो, इसके साथ किसी को शरीक न बतलाओ ......
 फिर उसने पुछा एहसान क्या है? मुहम्मद ने कहा खुदा की इबादत ऐसे करो गोया उसको देख रहे हो ....
रसूल के जवाब सुन कर उसने पूछा कयामत कब आयगी? 
मुहम्मद का उल्टा सीधा जवाब सुन कर वह चला गया तो अल्लाह के रसूल फरमाते है कि क्या तुम लोग जानते हो कि वह कौन था? 
जिब्रील अलैस्सलम थे, लोगो को दीन बताने आए थे." 
मुहम्मद ने लोगों पर अपना असर डालने के लिए झूट बोले. 
जिब्रील अलैस्सलम इसलामयात के बारे में खुद पूछ रहे थे, 
मुहम्मद कहते हैं वह लोगों को दीन समझाने आए थे. 


जीम. मोमिन 

Wednesday, 2 May 2012

Hadeesi Hadse 32




बुखारी नम्बर -१४-१६
मुहम्मद  कहते हैं कि कोई शख्स तब तक मुसलमान नहीं हो सकता जब तक मुझे अपने माँ-बाप और औलाद से भी ज़्यादः   चाहता हो.
मुहम्मद निर्मल बाबा से भी आगे हैं. आम मुसलमान मुहम्मद के नाम पर जान भी दे सकता है और जान ले भी सकता है. ये बात दुन्या औए खुद आलम-इस्लाम के लिए ज़हर है. मुहम्मद कितने खुद पसंद और महत्वा-कांक्ष साबित हुए.

बुखारी नम्बर -१९
मुहम्मद कहते हैं कि वह वक़्त आएगा कि लोगों का बेहतरीन माल बकरियाँ होंगी. वह इनको लेकर जंगलों और पहाड़ों पर घूमता फिरेगा ताकि उसका ईमान बचा रहे.
मुहम्मद को बकरियां बहुत पसंद थीं. वह इनके बाड़ों में अक्सर नमाज़ें पढ़ा करते. किस क़द्र बद ज़ौक थे? उनके कपड़ों से हमेशा बोक्राहिंद आती थी.
बुखारी नम्बर -२४
मुहम्मद कहते हैं कि हमें लोगों से उस वक़्त तक जिहाद करनी चाहिए जब तक वह ला इलाहा इल्लिलाह, मुहम्मदुर रसूल लिल्लाह कह दें और नमाज़ व् ज़कात अदा करने लगें और जब वह इन उमूर को अदा करने लगें तो वह मेरी जानिब से महफूज़ हुए. उनका हिसाब अल्लाह तअला करेगा.
दुश्मने-इसानियत कहते है कि जब तक लोग उनको अल्लाह का दूत मान लें, उनसे जंग करते रहो. यही मुहम्मदी इस्लाम असली चेहरा है. इस पर अमल कर रहे हैं तालिबान.
मुहम्मद को अपना रसूल मानने वाले ही इस वक़्त उनके एहकाम के कायल हैं, इनको जवाबन क्या आज इस समाज और इस मुल्क में रहने का हक मिलना चाहिए? मुसलमान देश के कानून का नाजायज़ फ़ायदा उठा रहे हैं . जम्हूरियत मुसलमानों पर हराम कर देना चाहिए अगर वह नए सिरे से इस्लाम को समझे.
बुखारी नम्बर -२५
मुहम्मद से दरयाफ्त किया गया कौन सा अमल अफज़ल हैं?
फ़रमाया अल्लाह और रसूल पर ईमान लाना.
इसके बाद?
दूसरा सवाल था.
अल्लाह की राह में जिहाद करना .
तीसरा अमल ?
सवाल था.
फ़रमाया हज खालिस .
कुरआन और हदीसों में सैकड़ों बार दोहराया गया है कि जेहाद करो यानी लड़ो मारो और मरो,
खूने-इंसानी बहाओ और लूट मार करके लोगों माले-गनीमत हासिल करो. जिहाद के नए मअनी आज के मक्कार ओलिमा ने लफज़ी तकरार से "जिहद करना" बतला रहे हैं. जिहद शब्द एक वचन है और इसका बहुवचन होता है.जिहाद. जिहद करना यानि जद्दो-जिहद और जिहाद इस्लामी इस्तेलाह में मज़हबी जंग अर्थात धर्म युद्ध.
सिर्फ इस्लाम ऐसा धर्म है जो लूट मर को पुन्य कार्य समझता है.
बुखारी नम्बर -२६
एक हदीस में रवायत है कि मुहम्मद कुछ लोगों को मॉल तकसीम कर रहे थे कि उनमे से एक को छोड़ दिया. इस पर इनके साथी विकास ने कहा, या रालूलल्लाह इसको क्यूं छोड़ दिया? जो कि मेरे नज़दीक सब से ज्यादह ईमान वाला मोमिन है. मुहम्मद ने कहा ये मत कहो कि अच्छा मोमिन है ये कहो कि सबसे अच्छा मुस्लिम है. कुछ देर खामोश रहने के बाद फिर विकास ने कहा
या रालूलल्लाह वह मेरे नज़दीक इन सब में ज्यादह ईमान वाला मोमिन है. रसूल ने कहा ये कहो कि तुम उसे मोमिन जानते हो, ये कहो कि मुस्लिम जानते हो नमाज़ रोज़े के साथ उसके ईमान को तो सिर्फ अल्लाह ही जनता है........
मोमिन और मुस्लिम का फर्क यहाँ मुहम्मद साफ़ साफ़ बयान कर रहे हैं.
इसी बात को मैं बार बार दोहराता हूँ कि कुछ बनना है तो ईमान दार मोमिन बनो, मुस्लिम बनना बहुत आसान है. मोमिन बन जाने के बाद मुस्लिम बनना गुनेह गारी है.
इस बात को मुहम्मद अपनी दीगर हदीसों के खिलाफ कह गए हैं.
  
जीम. मोमिन