Tuesday, 3 July 2012

Hadeesi Hadse 43


गोड पार्टिकल
मैं ने हमेशा साइंस दानो को आखिरी सच्चाई का खोजी माना है जो हमेशा अपनी खोज को अब तक सच कहते है. वह इकरार करते हैं कि उनके बाद भी कोई दूसरा सच हो सकता है. इसके खिलाफ हमारे धर्म गुरु अपनी मंतिक से तरह तरह के ईश्वरीय झूट गढ़ते रहते हैं. उनके कल्पना की उड़ान कभी ब्रह्मा, विष्णु, महेश के कार्य कलाप गढ़ती है तो कभी गोड की संतान ईसा गढ़ती है, तो कभी उसके पैगम्बरों को गढ़ लेती है.फिर इनकी दूकाने खोलती है.
आज इक्कीसवीं सदी में सैकड़ो साइंस दान गोड को नहीं बल्कि उसके पार्टिकल को तलाश रहे अर्थात भगवानो खुदा की दुम पकड़ने कि कोशिश कर रहे हैं . वह उसकी पहली हरकत की तलाश में हैं जिसे पाकर वह पूरी की पूरी गाय को समझने का काम कर करेंगे. इन सच्चाइयों को पाकर जब वह दुनया के खुदा को हमें बतलाएंगे तो खयाली खुदाओं का भेद खुल जायगा. कायनातों को नए खुदा की शक्ल दिखलाई जाएगी और यह इंसान सदियों से जो खुदाओं का सजदा और दंगा करता चला रहा है, अपने अतीत पर शर्मिंदा होगा. उसे मालूम होगा कि मख्लूकों में वही सबसे बदतर और सब से बेहतर मखलूक है. सब से ज्यादह समझदार और सबसे बड़ा बे वकूफ इंसान खुद है. बाकी जीव इससे अच्छे और सच्चे हैं.
हमारे साइंस दान जो असली पैगम्बर हैं, हमें इतनी ज़मीनें देंगे कि अगर हम चाहें तो अलग अलग ग्रहों पर तने-तनहा रह सकते हैं. देश प्रदेश नुमा ज़मीनों के फसाद इस दुन्य से उठ हो जाएँगे.
 


बुखारी ४९०
बण्डल बाज़ सहाबी अनस कहता है कि मुहम्मद पहले मस्जिद के खम्बे में टेक लगा कर खुतबा दिया करते, फिर जब मिम्बर तैयार हो गया तो उसमें टेक लगा कर बोलते.
आगे कहता है कि उस मिम्बर से ऐसी रोने की आवाज़ आती थी गोया दस महीने की गाभिन ऊंटनी की रोने की आवाज़ आती हो.


बुखारी ४७४
रेशमी हुल्लाह (एक किस्म का लिबास) मुहम्मद के हिसाब से मुसलामानों पर हराम है. किसी ने इनको इसका तोहफः दिया जिसे उन्हों ने लेकर अपने ख़लीफ़ा उमर को भिजवा दिया.उसे वापस लेकर उमर मुहम्मद के पास आए और सवाल किया कि जब रेशमी कपडे खुद अपने पर आप हराम करार देते हैं तो मुझे किस इरादे से भिजवाया? (मुहम्मद कशमकश में पड़  गए, कोई जवाब था.
उमर ने उस कुरते को अपने भाई को मक्का में भेज दिया को अभी तक काफ़िर था
*सारे मुआमले झूठे ईमान की अलामत हैं.


बुखारी ४७१ -७२-७३
मुहम्मद मुसलमानों के लिए सवाबों का मिक़दार मुक़र्रर करते है, कहते हैं जो शक्स जुमे की नमाज़ के लिए नहा धो कर पहली साइत चला उसको एक ऊँट की क़ुरबानी का सवाब मिलता है. दूसरी साइत में चला उसको एक गाय की क़ुरबानी का सवाब मिलता है, जो तीसरे साइत चलता है उसे एक सींग दार बकरी की क़ुरबानी का सवाब मिलता है, चौथी साइत चलने वाले को एक मुर्गी की क़ुरबानी का सवाब मिलता है और पांचवीं साइत जाने वाले को एक अंडे के सदके का सवाब मिलता है.
* मुहम्मद ने बतलाया ही नहीं कि जुमे की नमाज़ ही न पढने वाले को कितना अज़ाब मिलता है? शायद एक हाथी के बराबर का अज़ाब.
मुसलामानों ने मुहम्मदी अल्लाह के सवाबों और अज़ाबों का वज़न किस तरह उनके अल्लाह ने मुक़र्रर क्या? कभी कोह सफ़ा के बराबर तो कभी एक अंडे के बराबर. इन घामडों को इस्लाम के अक्ल का अँधा बना रख्खा है.
मुहम्मद कहते हैं जुमा से जुमा तक साबित कदमी से खशबू लगाकर नमाज़ अदा करने वालों के तमाम हफ्तावारी गुनाह मुआफ हो जाते हैं.


बुखारी ४६३
लहसुन
मुहम्मद ने कहा जो शख्स लहसुन खाकर मस्जिद में आए, वह मेरे साथ नमाज़ों में शरीक हो.
*हिदू मैथोलोजी लहसुन को अमृत मानती है मगर इसे राक्षस का उगला हुवा मानती है जो कि सागर मंथन से दस्तयाब हुवा था.
आज भी लहसुन दस्यों मरज़ की दवा बनी हुई है. इसके आलावा लहसुन टेस्ट मेकर है, मसालों में लहसुन अपना मुक़ाम रखती है. मुहम्मद को फायदे मंद चीजों में नुकसान नज़र आता है और मुज़िर में फायदा.


बुखारी ४४२
किसी ने मुहम्मद से पूछा कि क्या क़यामत के दिन हम लोग अल्लाह का दीदार कर सकते हैं? जवाब था कि क्या बगैर अब्र छाए चाँद को देखने में तुम्हें कोई शक है? लोगों कहा कहा नहीं नहीं. फिर मुहम्मद ने कहा बस क़यामत के दिन बिना शक शुबहा अल्लाह का दीदार होगा. हिदायत होगी हर गिरोह उसके साथ हो जाय जिसकी इबादत करता था, बअज़ आफ़ताब के साथ होंगे, बअज़ माहताब. बअज़ शयातीन ले साथअलगरज़    सिर्फ यही उम्मत मय मुनाफ़िकीन के बाकी रहेगी. इस वक़्त खुदाय तअला इनके सामने आयगा. इरशाद होगा हम तुम्हारे रब है, वह कहेगे हम पहचानते हैं. इसके बाद दोज़ख पर पुल रखा जायगा. तमाम रसूलों में जो सब से पहले इस पुल से गुजरेंगे वह मैं हूँगा. इस दिन सब रसूलों का कौल होगा " खुदा हम को सलामत रखना. खुदा हम को सलामत रखना. " दोज़ख में सादान के काँटों के मानिंद आंकड़े होंगे. अर्ज़ होगा, हाँ!
फ़रमाया बस वह सादान के काँटों की तरह ही हैं इनके बड़े होने का मिकदार खुदा ही जनता है.
हर एक के आमाल के मुताबिक वह खीँच लेगे - - -
*तहरीर बेलगाम बहुत तवील है जिसे न हम झेल पा रहे है न आप ही झेल पाएँगे. इसका सारांश क्या है ? एक पागल की बड़ जो फिल बदी बकता चला जाता है.
मुसलमान इसी में उलझे हुए हैं की ये बला है क्या ?


बुखारी ३९५ -४०४
कठ्बैठे मुहम्मद कहते हैं "जो शख्स नमाज़ में पेश इमाम से पहले सजदे से सर उठता है, उसको इस बात का खौफ़ नहीं रहता कि खुदा उसका सर गधे के सर की तरह कर देगा ."
*नमाज़ों की पाबंदी रखने वाला मुसलमान सजदे में पड़ा हुआ है, उसे कैसे मालूम हो कि पेश इमाम ने सर उठाया या नहीं. मगर मुहम्मदी अल्लाह सब के सरों की निगरानी करता रहता है. वह ज़ालिम दरोगा की तरह बन्दों की हरकत पर नज़र किए रहता है. इसी तरह मुहम्मद कहते हैं कि "नमाज़ों में अपनी सफ्हें सही कर लिया करो वर्ना अल्लाह तअला तुम्हारे चेहरों में मुखालफत कर देगा."
*इससे मुसलामानों को जिस कद्र जल्द हो सके पीछा छुडाएं ,


 बुखारी ३८०
मुहम्मद ने कहा "जो शख्स सुब्ह शाम जब नमाज़ के लिए जाता है तो अल्लाह उस के लिए जन्नत में तय्यारी करता है."
*मुहम्मदी अल्लाह को कायनात की निजामत से कोई मतलब नहीं, वह ऐसे की कामों में लगा रहता कि कौन शख्स क्या कर रहा है.

जीम. मोमिन 

Wednesday, 20 June 2012

Hadeesi Hadse 41


बुखारी २२३ 
मुहम्मद ने अपनी ज़िन्दगी में जो सब से बड़ा झूट गढ़ा वह किस्से-मेराज था. उससे बड़ा सानेहा ये है कि मुसलमान इस झूट पर आज भी यकीन और ईमान रखते हैं. 
खुराफाती ज़ेहन गढ़ता है कि - - -
"मैं मक्का में था, यकायक मेरे कमरे की छत शक हुई और जिब्रील नाज़िल हुए. उन्हों ने मेरा सीना चाक करके पाक किया और एक तिशत जो हिकमत और ईमान से लबरेज़ था, इससे मेरे सीने को पुर किया और सीने को बराबर कर दिया फिर मुझको आसमान की तरफ़ ले चले." 
जब आसमानी दुनिया के करीब पहुंचे. उन्हों ने दरवाज़ा खोलने की फरमाइश की. 
आवाज़ आई कौन है? 
जिब्रील ने कहा मैं जिब्रील. 
आवाज़ आई तुम्हारे साथ कौन है ? 
कहा मुहम्मद रसूललिलाह 
उधर से जवाब आता इन्हें नबी बना कर मबऊस किया गया ? 
जिब्रील के हाँ कहते ही दरवाज़ा खुल गया. 
हम आसमानी दुन्या पर पहुँचे वहां हमने देखा एक शख्स को कि उसके दाहिने जानिब भी रूहें है और बाएँ जानिब भी रूहें हैं. वह दाएं जानिब देख कर ख़ुशी से हंस देता है और बाएँ जानिब देख कर गम से देता है. उन्हों ने मुझे देखते ही मरहबा कहा और मेरा इस्तकबाल किया. बेटे और नबी के अलफ़ाज़ से मुझे पुकारा. मैंने जिब्रील से दरयाफ्त किया ये कौन हैं? बतलाया आदम अलैहिस्सलाम हैं. इनकी दाएं जानिब जो इनकी औलादें हैं वह जन्नती हैं और बाएँ जानिब जो औलादें है, वह दोजखी. वह दाएँ के जन्नती औलादों को देख कर हंस देते हैं और बाएँ जानिब दोजखियों को देख कर रो देते हैं. 
इसके बाद हम दूसरे आसमान की जानिब चढ़े. वहां भी सबिक़ा नौअय्यत दरपेश हुई और दरवाज़ा खोल दिया गया. 
मुहम्मद कहते हैं वहां उन्हों ने आसमानों पर ने आदम, ईसा, मूसा और इब्राहीम अलैहिस्सलामन को देखा. 
मुहम्मद आसमान चढ़ते, जिब्रील अलैहिस्सलाम आसमानों का दरवाज़ा खटखटाते और ईसा, इदरीस. आदम और इब्राहीम अलैहिस्सलामान से मिलते मिलाते और अपना खैर मक़दम कराते पांचवीं आसमान पर पहुँच जाते है जहाँ उनकी मुलाक़ात मूसा से होती है. उनसे गुफ्तुगू करने के बाद सातवें आसमान पर पहुँचते हैं जहाँ उनकी मुलाक़ात चिलमन की आड़ में बैठे अल्लाह मियाँ से होती है वह बैठे कुछ लिख रहे थे, उनके कलम की सरसराहट मुहम्मद को सुनाई पड़ रही थी. अल्लाह मियां से दरपर्दा पचास रिकत नमाज़ों का तोहफा मुसलमानों के लिए मुहम्मद को मिला. मुहम्मद लौटते हुए मूसा से फिर मिले और अपने तोहफ़े से मूसा को आगाही दी. मूसा ने उनको अल्लाह मियाँ के पास लौटाया कि जाओ, इतनी ज्यादा नमाज़ों को कम कराओ. मुहम्मद दो बार इसी तरह गए और लौटे.
बिल-आखीर पाँच रिकत मंज़ूर करा के वापस हुए. अल्लाह ने कहा अच्छा पांच बार पढो जिससे पचास रिकात का सवाब मिलेगा अब हमारे कौल में तब्दीली नहीं होगी. 
वापसी पर मूसा ने फिर मुहम्मद को समझाया कि तुम्हारी उम्मत के लिए यह भी बहुत ज्यादा है, कम कराओ, देखो मुझे अपनी उम्मत से सबक लिया है कि अल्लाह के फरमान की पाबंद नहीं हो सकी.
मुहम्मद ने ईसा से कहा - - -
"अब मुझको अपने परवर दिगार से शर्म आती है, वापस न जाऊँगा" अल्गाराज़ जिब्रील मुझे वहां से सदरतुल मुन्तेहा पर ले गए. मैंने मुख्तलिफ रंगों से मुज़य्यन पाया जो मेरी समझ में नहीं आ सकते. वहां से जन्नत में दाखिल हुवा. वहां की मिटटी को देखा कि मुश्क है और मोतियों के हार वहां मौजूद हैं. 
*यह मेराजुन नबी का वाकिया तब हुवा था जब मुहम्मद मक्के में थे. इतने बड़े वाकिए का ज़िक्र हज़रात दस साल बाद मदीने में अपने मुंह लगे साथी अनस को सुनते हैं.
वाज़ह हो कि एक बार और जिब्रील ने बचपन में इनका सीने को चीड फाड़ कर साफ़ और पाक किया था. मुहम्मद को चाहिए था कि वह सीने की बजाए अपना भेजा पाक साफ कराते जोकि झूट की गलाज़त से बदबू दार हो गया था.
मेराजुन नबी का वाकिया मुख्तलिफ ओलिमा ने अपने अपने ढंग से मुसलमानों को परोसा है. कहते हैं कि मुहम्मद के इस तवील सफ़र में इतना ही वक़्त लगा था कि जब जिब्रील इनको सफ़र से उस शक हुए कमरे पर छोड़ा था तो दरवाजे की कुण्डी हिल रही थी जिससे वह निकल कर गए थे और उनका तकिया अभी तक गरम था यानी पल झपकते ही आसमानी सफ़र से वापस आ गए थे.
कहते हैं कि मुहम्मद के साथी और दूसरे खलीफा उमर ने मुहम्मद को आगाह किया था कि अगर आप ऐसी पुडिया छोड़ते रहे तो इस्लाम की मुहीम एक दिन छू हो जाएगी.फिर मुहम्मद ने उसके बाद इस किस्म की बण्डल बजी नहीं की. 



जीम. मोमिन 

Hadeesi Hadse 40




बुखारी २६३ 
"बहरीन से माले-ग़नीमत का मुहम्मदी हिस्सा आया तो मुहम्मद ने इसे मस्जिद में रखवा दिया. वक़्त-मुक़रर्रा पर मस्जिद गए तो इधर कोई तवज्जो न किया. बाद नमाज़ के इधर जब आए तो चचा अब्बास ने उनसे अपना हिस्सा और अपने बेटे का हिस्सा तलब क्या . मुहम्मद ने कहा लेलो. अब्बास ने अपने चादर में इतना मॉल भरा कि उसको उठा कर अपने सर पर रख न सके, इस के लिए मुहम्मद से मदद चाही जिसे मुहम्मद ने इंकार कर दिया, गरज माल को कम करके जितना उठा सके, उठा कर ले गए. मुहम्मद अपने लालची चचा को जाते हुए तब तक देखते रहे कि जब तक वह नज़र से ओझल न हो गए." 

गौर तलब है कि इसी लालची की नस्लें इक दौर-हुक्मरान का, इक दौर बने. अब्बासी दौर . 
इस हदीस से साफ़ ज़ाहिर होता है कि मरकज़ में बैठे मुहम्मद माल-गनीमत (लूट पट के माल) को कैसे अपने ख़ानदान में तक़सीम करते. लूट पाट का पाँचवां हिस्सा अल्लाह और मुहम्मद का होता और ४/५ हिस्सा लुटेरों का होता. इस्लाम इस तरह से उरूज पर आया जिसे तालिबान आज भी जारी रखना चाहते हैं. 

बुखारी २३३ 
वाकिया है कि मुहम्मद एक बार सिर्फ तहबन्द पहन कर काबा की मरम्मत कर रहे थे कि एक पत्थर उठाने में उनकी तहबंद दरपेश आ रही थी, ये देख कर उनके चाचा अब्बास ने कहा बेटा !तहबन्द उतार कर काँधे पर रख लो तो आसानी हो जाए. मुहम्मद ने वैसा ही किया यानी बरहना हो गए. उसके बाद वह बेहोश होके गिर पड़े. मुहम्मद कहते हैं कि उसके बाद मैं कभी भी नंगा न हुवा. 

बुखारी २३७ 
अनस से हदीस है कि खैबर के लिए जब मुहम्मद चले तो उनके हामी मुस्लिम लुटेरों ने अलल सुब्ह खैबर पर हमला करने से पहले फज्र की नमाज़ अदा की, फिर मुहम्मद ने घोड़े पर सवार होकर खैबर की गलियों में गश्त करना शुरू किया और उसके बाद तीन बार नराए-तकब्बुर लगाया और एलान किया कि "खैबर बर्बाद हुवा, कि हम जब किसी कौम पर नाजिल होते हैं तो उसकी बर्बादी का सामान होता है." 
लोग अपने अपने कामों पर जा रहे थे कि उनकी आवाज़ पर उनके लुटेरे सामने आ गए, अलकिस्सा निहायत सख्ती के साथ जंग हुई. मुसलामानों की फतह याबी हुई. बहुत से क़ैदी हाथ आए. 
एक लुटेरा वह्यिः कलबी मुहम्मद के सामने हाज़िर हुवा और कहा ऐ मुहम्मद मुझे एक लौंडी अता की जाए, मुहम्मद ने कहा जाओ एक लौड़ी पसंद करके ले लो. उन्हों ने सफ़िया बिन्त हई को चुना था कि एक शख्स मुहम्मद के सामने आया और कहा आपने सफ़िया बिन्त हई को वह्यिः कलबी को दे दिया हालाँकि वह बनी क़रीज़ा और बनी नुज़ैर दोनों की सरदार रह चुकी हई और आपके काबिल थी. 
मुहम्मद ने कहा वह्यिः कलबी को बुलाओ, जब वह मुहम्मद के सामने हाज़िर हो गया तो मुहम्मद ने कहा तुम उस लौड़ी को छोड़कर किसी और को लेलो. चुनाँच मुहम्मद ने उसे आज़ाद करके उसके साथ निकाह कर लिया. 
रस्ते में ही मुहम्मद की रखैल उम्मे सलीम सफ़िया को दुल्हन बनाया और वहीँ शबे-ज़हफ़ हुई. सुब्ह को मुहम्मद दूलह बने हुए जब बहार आए तो लोगों को हुक्म दिया कि जिनके पास जो खाना हो वह हाज़िर करें, दस्तर ख्वान चुना जाए. लिहाज़ा लोगों ने घी, सत्तू खजूरें वगैरह हाज़िर कीं . यही मुहम्मद का वलीमा था. 
मुहम्मद ने वाकई खैबर बर्बाद कर दिया. यहूदियों का खुशहाल कस्बा मुहम्मद की निगाह में बरसों से चढ़ा था. 
किसी भी खतरे से बेनयाज़ बस्ती सुब्ह की नींद में डूबी यहूदी बस्ती, ज़ालिम लुटेरे मुहम्मदी फौज के नर्गे में थी. दरवाजे खोला तो सामने मौत खड़ी थी. मर्द मारे गए या खेतों खाल्यानो में भागे. औरतें और बच्चे लौंडी और गुलाम बना लिए गए. बाप भाई औए शौहर की लाशों के दरमियान मुहम्मद के साथ मजलूम खातून निकाह और सुहाग रात मनाने पर मजबूर हो गईं. 
मुसलमानों की तरह ही यहूदियों के पास भी मुहम्मदी जरायम की दस्तावें हैं. आज अपने आबाई वतन मदीना और मक्का पर वह दावेदारी करते हैं तो हक बजानिब हैं



जीम. मोमिन 

Tuesday, 12 June 2012

Hadeesi haadse 39




हदीस २२२



एक तवील हदीस में दो एक बातें ही काबिले-ज़िक्र हैं कि गुस्ल के लिए पानी होने पर मिटटी से ग़ुस्ल किया जा सकता है. मुहम्मद कहते हैं,
 " मिटटी का इस्तेमाल करो क्योकि वह तुन्हारे गुस्ल का क़ायम मुक़ाम हो जायगी. "

मुहम्मद मिटटी के ढेले से इस्तेंजा करके पाक हो जाते थे जिसकी पैरवी आज भी आम तौर पर मुसलमान करते हैं. मुहम्मद मिटटी के ढेले से शौच का कम लेते जिसकी पैरवी जुज़वी तौर पर आज भी मुसलमान करते है और कश्मीर में खास तौर से, वह भी मजबूरी पर. मिटटी से गुस्ल कैसे किया जाता है ? ये बात नाक़ाबिले-फ़हेम है. क्या परिदों, चरिदों और दरिदों की तरह धूल गर्द में लोट कर उनकी फ़ितरत को अपनाया जा सहता है? मगर उसमे इंसानी जिस्म को पाकी, तहारत या सफ़ाई नहीं मिलती ही मुसलमान इस तरीके का इस्तेमाल करता है.

इसी हदीस में ज़िक्र है कि एक औरत को अली, बमय उसके ऊँट के अगवा कर के मुहम्मद के पास ले आते हैं, मुहम्मद उसके मुश्कीज़े से बराए नाम पानी लेते हैं जिसमे इतनी बरकत होती है कि सभी काफ़िला वजू और ग़ुस्ल कर लेता है. इसतरह 'वाटर आफ अरब' का जादू हदीसों में बार बार आता है जो कि देखा गया है कि इसके लिए थोड़े से पानी की ज़रुरत पहले ज़रूर होती है.जो गैर फितरी बात है और पूरी तरह से झूट है.

नादान हदीस नवीस लिखते हैं कि उस औरत ने अपने कबीले में कहा,
 "खुदा की क़सम वह सारी ज़मीन से बड़ा जादू गर है"

जादूगर ? जो एलन के साथ जूट का मुजाहिरा करता है.

जाहिलों का कबीला मुहम्मद को बार बार जादूगर कहते हैं, यहीं तक नहीं, कुरान में मुहम्मद खुद को जादू गर कहके अल्लाह के रसूल होने की खबर देते हैं जिसे ओलिमा 'नौज बिल्लाह' कहकर बात को रफ़ू करते हैं.

देखिए कि मुहम्मद का गिरोह खुद तस्लीम करता कि वह लुटेरे हैं.

"इसके बाद मुशरेकीन पर मुसलामानों ने लूट मार शुरू की मगर उस औरत के क़बीले  पर दस्ते-दराज़ी नहीं की."

मुहह्म्मद गिरोह बना कर लूट पाट और क़त्ल गारत गरी करते जोकि बाद में माले-गनीमत की शक्ल में इस्लाम का ज़रिये-हुक्मरानी बन गया


जीम. मोमिन 

Thursday, 7 June 2012

aHadeesi Hadse - 38



हदीसी हादसे  


हदीस २२२ 
एक तवील हदीस में दो एक बातें ही काबिले-ज़िक्र हैं कि गुस्ल के लिए पानी न होने पर मिटटी से ग़ुस्ल किया जा सकता है. मुहम्मद कहते हैं.
" मिटटी का इस्तेमाल करो क्योकि वह तुन्हारे गुस्ल का क़ायम मुक़ाम हो जायगी. " 
मुहम्मद मिटटी के ढेले से इस्तेंजा करके पाक हो जाते थे जिसकी पैरवी आज भी आम तौर पर मुसलमान करते हैं. मुहम्मद मिटटी के ढेले से शौच का काम  लेते जिसकी पैरवी जुज़वी तौर पर आज भी मुसलमान करते है और कश्मीर में खास तौर से, वह भी मजबूरी पर.
 मिटटी से गुस्ल कैसे किया जाता है ? ये बात नाक़ाबिले-फ़हेम है.क्या परिदों, चरिदों और दरिदों की तरह धूल गर्द में लोट कर उनकी फ़ितरत को अपनाया जा सहता है? या फिर साधुओं की तरह पूरे जिस्म भबूत मलकर.
 मगर उसमे इंसानी जिस्म को पाकी, तहारत या सफ़ाई नहीं मिलती न ही मुसलमान इस तरीके का इस्तेमाल करता है. 
इसी हदीस में ज़िक्र है कि एक औरत को अली बमय उसके ऊँट के अगवा कर के मुहम्मद के पास ले आते हैं, मुहम्मद उसके मुश्कीज़े से बराए नाम पानी लेते हैं जिसमे इतनी बरकत होती है कि सभी काफ़िला वजू और ग़ुस्ल कर लेता है. इसतरह 'वाटर आफ अरब' का जादू हदीसों में बार बार आता है जो कि देखा गया है कि इसके लिए थोड़े से पानी की ज़रुरत पहले ज़रूर होती है, जो गैर फितरी बात है और पूरी तरह से झूट है. 
नादान हदीस नवीस लिखते हैं कि उस औरत ने अपने कबीले में कहा "खुदा की क़सम वह सारी ज़मीन से बड़ा जादू गर है" 
जादूगर ? जो एलान के साथ जूट का मुजाहिरा करता है. 
जाहिलों का कबीला मुहम्मद को बार बार जादूगर कहता है  , यहीं तक नहीं, कुरान में मुहम्मद खुद को जादू गर कहके अल्लाह के रसूल होने की खबर देते हैं जिसे ओलिमा 'नौज बिल्लाह' कहकर बात को रफ़ू करते हैं. 
देखिए कि मुहम्मद का गिरोह खुद तस्लीम करता कि वह लुटेरे हैं. 
"इसके बाद मुशरेकीन पर मुसलामानों ने लूट मार शुरू की मगर उस औरत के कबीले पर दस्ते-दराज़ी नहीं की. 
मुहह्म्मद गिरोह बना कर लूट पाट और क़त्ल ओ गारत गरी करते जोकि बाद में माले-गनीमत की शक्ल में इस्लाम का ज़रिये-हुक्मरानी बन गया. 


बुख़ारी २४५-४६ 
शोख आयसा कहती हैं कि जब मुहम्मद नमाज़ में होते तो मैं क़िबला जानिब पैर करके लेट जाती. सजदा करके वह इशरा   करते तो मैं पैर समेट लेती, जब वह सजदे में जाते तो फिर पैर उसी तरह कर लेती. 
दूसरी हदीस में कहती हैं कि जब मुहम्मद नमाज़ पढ़ते तो मैं उनके सामने जनाज़े की तरह पड़ी रहती. 
*बूढा रसूल कमसिन बीवी की तमाम अदाएं झेलता था और अपने रचे क़ानून क़ायदे से बेनयाज़ हो जाता. 

बुखारी २६३ 
बहरीन से माले-ग़नीमत का मुहम्मदी हिस्सा आया तो मुहम्मद ने इसे मस्जिद में रखवा दिया. वक़्त-मुक़रर्रा पर मस्जिद गए तो इधर कोई तवज्जो न किया. बाद नमाज़ के इधर जब आए तो चचा अब्बास ने उनसे अपना हिस्सा और अपने बेटे का हिस्सा तलब क्या . मुहम्मद ने कहा लेलो. अब्बास ने अपने चादर में इतना मॉल भरा कि उसको उठा कर अपने सर पर रख न सके, इस के लिए मुहम्मद से मदद चाही जिसे मुहम्मद ने इंकार कर दिया, गरज माल को कम करके जितना उठा सके, उठा कर ले चले. मुहम्मद अपने लालची चचा को जाते हुए तब तक देखते रहे कि जब तक वह नज़र से ओझल न हो गए. 
गौर तलब है कि इसी लालची की नस्लें इक दौर-हुक्मरान इक दौर बने. इक अब्बासी दौर की हुक्मरान बने. 
इस हदीस से साफ़ ज़ाहिर होता है कि मरकज़ में बैठे मुहम्मद माले-गनीमत (लूट पट के माल) को कैसे अपने ख़ानदान में तक़सीम करते. लूट पाट का पाँचवां हिस्सा अल्लाह और मुहम्मद का होता और ४/५ हिस्सा लुटेरों का होता. इस्लाम इस तरह से उरूज पर आया जिसे तालिबान आज भी जारी रखना चाहते हैं. 

बुखारी २३३ 
वाकिया है कि मुहम्मद एक बार सिर्फ तहबन्द पहन कर काबा की मरम्मत कर रहे थे कि एक पत्थर उठाने में उनकी तहबंद दरपेश आ रही थी, ये देख कर उनके चाचा अब्बास ने कहा बेटा !तहबन्द उतार कर काँधे पर रख लो तो आसानी हो जाए. मुहम्मद ने वैसा ही किया यानी बरहना हो गए. उसके बाद वह बेहोश होके गिर पड़े. मुहम्मद कहते हैं कि उसके बाद मैं कभी भी नंगा न हुवा.
इस क़बीलाई माहौल में अनपढ़ और कठमुल्ला मुसलमानों का पैगम्बर बना, अंजाम में मुसलमान दुन्या की सबसे पसमांदा कौम ठहरी.  
बुखारी २३७ 
अनस से हदीस है कि खैबर के लिए जब मुहम्मद चले तो उनके हामी मुस्लिम लुटेरों ने अलल सुभ खैबर पर हमला करने से पहले फज्र की नमाज़ अदा की, फिर मुहम्मद ने घोड़े पर सवार होकर खैबर की गलियों में गश्त करना शुरू किया और उसके बाद तीन बार नाराए-तकब्बुर लगाया और एलान किया कि "खैबर बर्बाद हुवा, कि हम जब किसी कौम पर नाजिल होते हैं तो उसकी बर्बादी का सामान होता है." 
लोग अपने अपने कामों पर जा रहे थे कि उनकी आवाज़ पर उनके लुटेरे सामने आ गए, अलकिस्सा निहायतसखती के साथ जंग हुई. मुसलामानों की फतह याबी हुई. बहुत से क़ैदी हाथ आए. 
एक लुटेरा वह्यिः कलबी मुहम्मद के सामने हाज़िर हुवा और कहा ऐ मुहम्मद मुझे एक लौंडी अता की जाए, मुहम्मद ने कहा जाओ एक लौड़ी पसंद करके ले लो. उन्हों ने सफ़िया बिन्त हई को चुना था  कि एक शख्स मुहम्मद के सामने आया और कहा आपने सफ़िया बिन्त हई को वह्यिः कलबी को दे दिया, हालाँकि वह बनी क़रीज़ा और बनी नुज़ैर दोनों की सरदार रह चुकी है  और आपके काबिल थी. 
मुहम्मद ने कहा वह्यिः कलबी को बुलाओ, जब वह मुहम्मद के सामने हाज़िर हो गया तो मुहम्मद ने कहा तुम उस लौड़ी को छोड़कर किसी और को लेलो. चुनाँच मुहम्मद ने उसे आज़ाद करके उसके साथ निकाह कर लिया. 
रस्ते में ही मुहम्मद की रखैल उम्मे सलीम ने  सफ़िया को दुल्हन बनाया और वहीँ शबे-ज़हफ़ (सुहाग रात) हुई. सुब्ह को मुहम्मद दूलह बने हुए जब बाहर  आए तो लोगों को हुक्म दिया कि जिनके पास जो खाना हो वह हाज़िर करें, दस्तर ख्वान चुना जाए. लिहाज़ा लोगों ने घी, सत्तू खजूरें वगैरह हाज़िर कीं . यही मुहम्मद का वलीमा था. 
मुहम्मद ने वाकई खैबर बर्बाद कर दिया. यहूदियों का खुशहाल कस्बा मुहम्मद की निगाह में बरसों से चढ़ा था. 
किसी भी खतरे से बेनयाज़ बस्ती सुब्ह की नींद में डूबी यहूदी बस्ती, ज़ालिम लुटेरे मुहम्मदी फौज के नरगे में थी. दरवाजे खोला तो सामने मौत खड़ी थी. मर्द मारे गए या खेतों खाल्यानो में भागे. औरतें और बच्चे लौंडी और गुलाम बना लिए गए. बाप भाई औए शौहर की लाशों के दरमियान मुहम्मद के साथ मजलूम खातून निकाह और सुहाग रात मनाने पर मजबूर हो गईं. 
मुसलमानों की तरह ही यहूदियों के पास भी मुहम्मदी जरायम की दस्तावें हैं. आज अपने आबाई वतन मदीना और मक्का पर वह दावेदारी करते हैं तो हक बजानिब हैं. 

जीम. मोमिन